दूरवर्ती एशिया से संबन्धित अध्ययन की कक्षा सन् 2008 में स्थापित हुई। इस कक्षा में तीन विभाग हैः चीनी अध्ययन जापानी अध्ययन और भारतीया अध्ययन।हर विभाग का एक अलग अकादमीक सचिवालय है पर तीनों के लिए सिर्फ एक मुख्य कार्यालय है। आगे और भी विभाग या कक्षाएं मिल सकेंगी।2008 में अक्तुबर में चीनी अध्ययन के विभाग ने औम्ब्रोज़ियाना और दुसरे इतालवी पुस्तकालयों में मींग युग का यूरोपीय और चीनी मानचित्रकला पढ़ने के लिए Hangzhou के Zhejiang विश्वविध्यालय से प्रोफ़ेसर Huang Shijian को बुलाया। जापानी अध्ययन के विभाग को बोर्रोमाइका युग में यूरोप और जापान के बीच सांस्कृतिक सम्बन्धों में रूचि है।जिस राजस्थान और जनजाति सांस्कृतियाँ विशेषत संबंधी निधी को 2008 में स्वर्गीय प्रोफ़ेसर एंरीको फासाना ने विरासत के रूप में औम्ब्रोज़ियाना को दे दिया उसकी सूची भारतीय अध्ययन का विभाग कर रहा है।पहली सार्वजनिक अध्ययन बैठक और शास्त्रीय संस्थापकों की नामज़दगी सन् 2008 की 27 नवम्बर को हुई। पहली सार्वजनिक अध्ययन बैठक के विवरण और रिपार्ट यहाँ छापे गये हैं।
इस के बाद Asiatica Ambrosiana की विषय वस्तु संबंधी भारतीय चीनी और जापानी कलाकृतिओं और पांडुलिपिओं की प्रदर्शनी का उद्घाटन किया गया है। प्रदर्शनी का सूचीपत्र इस ग्रन्थ में भी छापा गया है।
Sezione indiana भारतीय संस्कृति विभाग
दूरवर्ती एशिया से संबन्धित अध्ययन की कक्षा सन् 2008 में स्थापित हुई। इस कक्षा में तीन विभाग हैः चीनी अध्ययन जापानी अध्ययन और भारतीया अध्ययन।हर विभाग का एक अलग अकादमीक सचिवालय है पर तीनों के लिए सिर्फ एक मुख्य कार्यालय है। आगे और भी विभाग या कक्षाएं मिल सकेंगी।2008 में अक्तुबर में चीनी अध्ययन के विभाग ने औम्ब्रोज़ियाना और दुसरे इतालवी पुस्तकालयों में मींग युग का यूरोपीय और चीनी मानचित्रकला पढ़ने के लिए Hangzhou के Zhejiang विश्वविध्यालय से प्रोफ़ेसर Huang Shijian को बुलाया। जापानी अध्ययन के विभाग को बोर्रोमाइका युग में यूरोप और जापान के बीच सांस्कृतिक सम्बन्धों में रूचि है।जिस राजस्थान और जनजाति सांस्कृतियाँ विशेषत संबंधी निधी को 2008 में स्वर्गीय प्रोफ़ेसर एंरीको फासाना ने विरासत के रूप में औम्ब्रोज़ियाना को दे दिया उसकी सूची भारतीय अध्ययन का विभाग कर रहा है।पहली सार्वजनिक अध्ययन बैठक और शास्त्रीय संस्थापकों की नामज़दगी सन् 2008 की 27 नवम्बर को हुई। पहली सार्वजनिक अध्ययन बैठक के विवरण और रिपार्ट यहाँ छापे गये हैं।
इस के बाद Asiatica Ambrosiana की विषय वस्तु संबंधी भारतीय चीनी और जापानी कलाकृतिओं और पांडुलिपिओं की प्रदर्शनी का उद्घाटन किया गया है। प्रदर्शनी का सूचीपत्र इस ग्रन्थ में भी छापा गया है।